बहू बनी आधुनिक श्रवणकुमार! चार बेटे रहे पीछे, सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा

हरिद्वार से हापुड़ तक यात्रा के दौरान जहां-जहां से यह परिवार गुजर रहा है, वहां लोग इस अनोखी कांवड़ यात्रा को देखने के लिए रुक रहे हैं. कई श्रद्धालु उनके साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, जबकि कुछ लोग उनका उत्साहवर्धन करते हुए सुरक्षित यात्रा की शुभकामनाएं दे रहे हैं. यात्रा मार्ग पर मौजूद लोगों का कहना है कि कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह सेवा, त्याग, समर्पण और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देती है. पिंकी और उनकी बेटी राधा ने अपने व्यवहार से इस भावना को जीवंत कर दिया है.

बहू बनी आधुनिक श्रवणकुमार! चार बेटे रहे पीछे, सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा

कांवड़ यात्रा को आमतौर पर भगवान शिव के प्रति आस्था, गंगाजल और तपस्या से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन इस बार हरिद्वार से सामने आई एक तस्वीर ने लोगों को भावुक कर दिया है. यहां उत्तर प्रदेश के हापुड़ की रहने वाली एक बहू अपनी वृद्ध सास को विशेष कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा कर रही है. 


इस सेवा और समर्पण की यात्रा में परिवार की सबसे छोटी सदस्य, नन्ही पोती भी अपनी दादी का पूरा साथ निभा रही है. सोशल मीडिया से लेकर यात्रा मार्ग तक, इस परिवार की चर्चा श्रद्धा, संस्कार और रिश्तों की मिसाल के रूप में हो रही है.


हापुड़ निवासी ऊषा देवी लंबे समय से गंगा स्नान और कांवड़ यात्रा करने की इच्छा रखती थीं. उम्र और शारीरिक कमजोरी के कारण उनके लिए इतनी लंबी पैदल यात्रा करना संभव नहीं था. परिवार में चार बेटे होने के बावजूद उनकी इस इच्छा को पूरा करने का जिम्मा उनकी बहू पिंकी ने उठाया.


पिंकी अपनी सास को लेकर हरिद्वार पहुंचीं. सबसे पहले उन्होंने हर की पैड़ी पर विधि-विधान से गंगा स्नान कराया. इसके बाद विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में ऊषा देवी को बैठाया और हरिद्वार से हापुड़ तक की पैदल यात्रा शुरू कर दी. यह सफर केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि परिवार के प्रति समर्पण और सेवा भावना का भी प्रतीक बन गया है.


पिंकी का कहना है कि वह अपनी सास की सेवा को बोझ नहीं, बल्कि अपने जीवन का सौभाग्य मानती हैं. उनके अनुसार, जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष और त्याग करते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना परिवार का सबसे बड़ा धर्म है.


यात्रा के दौरान जब भी श्रद्धालु या राहगीर उन्हें अपनी सास को कांवड़ में बैठाकर ले जाते हुए देखते हैं, तो रुककर उनका अभिवादन करते हैं. कई लोग इस दृश्य को देखकर भावुक हो जाते हैं और पिंकी को आधुनिक श्रवणकुमार की संज्ञा दे रहे हैं.


इस पूरी यात्रा का सबसे भावुक पहलू परिवार की छोटी सदस्य राधा है. कम उम्र होने के बावजूद वह अपनी दादी की सेवा में पूरे मन से लगी हुई है. कभी वह कांवड़ संभालने में मदद करती है तो कभी दादी का हालचाल पूछती रहती है.


रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि आज के समय में इतनी छोटी उम्र में ऐसे संस्कार और सेवा भाव बहुत कम देखने को मिलते हैं. राधा का व्यवहार यह दिखाता है कि परिवार में मिले संस्कार बच्चों के व्यक्तित्व को किस तरह आकार देते हैं.


हरिद्वार से हापुड़ तक यात्रा के दौरान जहां-जहां से यह परिवार गुजर रहा है, वहां लोग इस अनोखी कांवड़ यात्रा को देखने के लिए रुक रहे हैं. कई श्रद्धालु उनके साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, जबकि कुछ लोग उनका उत्साहवर्धन करते हुए सुरक्षित यात्रा की शुभकामनाएं दे रहे हैं.


यात्रा मार्ग पर मौजूद लोगों का कहना है कि कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह सेवा, त्याग, समर्पण और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देती है. पिंकी और उनकी बेटी राधा ने अपने व्यवहार से इस भावना को जीवंत कर दिया है.


आज जब अक्सर परिवारों में बढ़ती दूरियों और रिश्तों में बदलाव की चर्चा होती है, ऐसे समय में यह परिवार भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आया है. एक बहू का अपनी सास को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराना और एक छोटी पोती का दादी की सेवा में हर कदम पर साथ देना यह संदेश देता है कि रिश्तों की मजबूती प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी से बनती है.


हरिद्वार से हापुड़ तक की यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. यह सेवा, करुणा, पारिवारिक एकता और भारतीय संस्कारों का ऐसा उदाहरण है, जिसने कांवड़ यात्रा के बीच मानवीय संवेदनाओं की एक खूबसूरत तस्वीर पेश की है. यही कारण है कि यह परिवार श्रद्धालुओं के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लोगों की सराहना और प्रेरणा का केंद्र बनता जा रहा है.