Jagnnath Rath Yatra 2026 Date: इस बार कब निकलेंगे महाप्रभु नगर भ्रमण पर? जानें पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा की सही तिथि और महत्व

इस साल तिथियों को लेकर थोड़ा असमंजस है, इसलिए हर भक्त के मन में यही सवाल है कि जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी या 17 जुलाई से? आइए जान लें रथ यात्रा की सही तारीख और इस खास पर्व का धार्मिक महत्व।धार्मिक मान्यताओ के अनुसार,  गुंडिचा  मंदिर भगवान जगन्नाथ का मौसी का घर है। तो आइए जानते हैं कि साल 2026 में यह पवित्र रथ यात्रा कब से शुरू होगी।

Jun 08, 2026 - 19:49
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Jagnnath Rath Yatra 2026 Date: इस बार कब निकलेंगे महाप्रभु नगर भ्रमण पर? जानें पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा की सही तिथि और महत्व

ओडिशा के पुरी में भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू होने वाली है। ये रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अगाध आस्था, भक्ति और अलौकिक शक्ति का महाकुंभ है। हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की एक झलक पाने के लिए पुरी धाम पहुंचने लगे हैं। 9 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को रथ त्योहार या श्री गुंडीचा यात्रा भी कहा जाता है, जहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ विशालकाय रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। 

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देखने के लिए देश-दुनिया से लोग ओडिशा  के पुरी शहर आते हैं। पूरे साल में यही वो पावन मौका होता है जब महाप्रभु नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस भव्य रथ यात्रा  का उत्सव पूरे 10 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। 

आपको बता दें कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान नारायण बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और देवी सुभद्रा को रथ में विराजमान कर के जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। 


क्योंकि इस साल तिथियों को लेकर थोड़ा असमंजस है, इसलिए हर भक्त के मन में यही सवाल है कि जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी या 17 जुलाई से? आइए जान लें रथ यात्रा की सही तारीख और इस खास पर्व का धार्मिक महत्व।धार्मिक मान्यताओ के अनुसार,  गुंडिचा  मंदिर भगवान जगन्नाथ का मौसी का घर है। तो आइए जानते हैं कि साल 2026 में यह पवित्र रथ यात्रा कब से शुरू होगी।


जानिए कब है रथ यात्रा 2026 की तिथि -

रथ यात्रा का उत्सव हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया का आरंभ 15 जुलाई को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर होगा। 

द्वितीया तिथि का समापन 16 जुलाई को सुबह 8 बजकर 52 मिनट पर होगा। इस साल जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 को निकाली जाएगी।  रथ यात्रा 16 जुलाई से प्रारंभ होकर 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ संपन्न होगी।

क्या आप जानते हैं भव्य रथों की खासियत इस यात्रा में तीन अलग-अलग रथ होते हैं, जिन्हें नीम की पवित्र लकड़ियों से बिना किसी कील या लोहे के इस्तेमाल के बनाया जाता है:

नंदीघोष: 
भगवान जगन्नाथ का रथ (लाल और पीले रंग का)। 
तालध्वज: 
भाई बलभद्र का रथ (लाल और हरे रंग का)। 
दर्पदलन: 
बहन सुभद्रा का रथ (लाल और काले रंग का)।


जानिए रथ यात्रा का महत्व-

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जब निकलती है तब रथ को खींचने के लिए भारी संख्या में भक्तगण जुटते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ को खींचने वाले को 100 यज्ञ कराने के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति होती है। 


साथ ही कहा जाता है कि कहते हैं जो भी व्यक्ति जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में शामिल होता है, उसे हर प्रकार की सुख-समृद्धि मिलती है और सभी कष्टों से भी छुटकारा मिल जाता है। आपको बता दें कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में अधूरी मूर्तियों की पूजा की जाती है। यहां भगवान जगन्नाथ, बलराम और देवी सुभद्रा की मूर्तियां काष्ठ यानी लकड़ियों की बनी हुई है।

रथ यात्रा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें-

इन विशाल रथों को खींचने के लिए किसी भी जानवर (घोड़े या हाथी) का इस्तेमाल नहीं होता। रथों में लकड़ी के कृत्रिम घोड़े लगाए जाते हैं और इन्हें पूरी तरह से भक्तों द्वारा रस्सियों के सहारे खींचा जाता है।  


रथ यात्रा के रथों के निर्माण में लोहे या किसी अन्य धातु का उपयोग वर्जित है, इसलिए बिना एक भी कील के ये रथ तैयार किए जाते हैं। आपको बता दें कि भगवान जब रथ यात्रा के लिए निकलते हैं तो पूरे मार्ग को सोने की झाड़ू से साफ किया जाता है।


जगन्नाथ रथ यात्रा का अनोखा इतिहास जानें जब बीमार पड़ते हैं भगवान इस विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक इतिहास और परंपरा जुड़ी है, जो इसे दुनिया के अन्य सभी त्योहारों से अलग बनाती है। इनके बारे में नीचे प्वाइंट्स में बताया गया है।

1. शाही स्नान और प्रभु की बीमारी: 

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन मनाया जाता है। इस खास दिन पर प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को उनके रत्न सिंहासन से उतार कर स्नान मंडप में लाया जाता है। यहाँ उन्हें 108 कलशों के सुगंधित जल से शाही स्नान कराया जाता है।

2. 15 दिनों का एकांतवास (अनासर काल): 

मान्यता है कि इस भारी स्नान के कारण प्रभु बीमार हो जाते हैं और उन्हें तेज बुखार आ जाता है। इसके बाद अगले 15 दिनों तक भगवान को एक विशेष कक्ष में रखा जाता है, जिसे 'अनासर घर' कहते हैं। इस दौरान मंदिर के मुख्य वैद्यों और चुनिंदा सेवकों के अलावा किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं होती। इन 15 दिनों तक भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर पाते हैं। 

3. 'छेरा पहरा' की पावन रस्म: 

जब भगवान पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, तो आषाढ़ द्वितीया के दिन यात्रा शुरू होती है। रथ रवानगी से पहले पुरी के गजपति राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथों के मंडप और मार्ग को साफ करते हैं। इस रस्म को 'छेरा पहरा' कहा जाता है, जो यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब एक समान हैं। इसके बाद ही रथ खींचने की प्रक्रिया शुरू होती है।

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Vidushi Mishra

Sub Desk Editor at NewsASR.Com

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