मुर्दे से टैक्स मांग रहा था आयकर विभाग, हाई कोर्ट ने सुनाई खरी-खरी, कानून बदलने की दी सलाह

हाईकोर्ट ने मृत व्यक्ति के नाम पर जारी आयकर नोटिस, पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) आदेश और टैक्स की मांग को पूरी तरह रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत जारी वैध नोटिस ही पूरी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया की नींव होता है. यदि नोटिस ही मृत व्यक्ति के नाम पर जारी हुआ है तो उसके आधार पर की गई पूरी कार्रवाई शुरू से ही अवैध मानी जाएगी.

Jul 24, 2026 - 11:06
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मुर्दे से टैक्स मांग रहा था आयकर विभाग, हाई कोर्ट ने सुनाई खरी-खरी, कानून बदलने की दी सलाह

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की एक बड़ी लापरवाही को उजागर किया है. कोर्ट ने एक ऐसे शख्स के खिलाफ टैक्स नोटिस को रद्द कर दिया है, जिसकी मौत साल 2024 में ही हो चुकी थी. 


अदालत ने कहा कि किसी मरे हुए व्यक्ति के नाम पर आयकर विभाग की ओर से नोटिस जारी करना कानूनन अमान्य (शून्य) है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी गलती को बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाकर या तकनीकी त्रुटि बताकर ठीक नहीं किया जा सकता.

हाईकोर्ट ने मृत व्यक्ति के नाम पर जारी आयकर नोटिस, पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) आदेश और टैक्स की मांग को पूरी तरह रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत जारी वैध नोटिस ही पूरी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया की नींव होता है. यदि नोटिस ही मृत व्यक्ति के नाम पर जारी हुआ है तो उसके आधार पर की गई पूरी कार्रवाई शुरू से ही अवैध मानी जाएगी.


यह मामला आशा दुबे की याचिका से जुड़ा है. उनके पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो गया था. इसके बावजूद आयकर विभाग ने मार्च 2025 में उनके नाम पर धारा 148 के तहत नोटिस जारी कर दिया. आयकर विभाग का कहना था कि ओमैक्स ग्रुप पर हुई तलाशी के दौरान 27.44 लाख रुपये के कथित नकद लेनदेन की जानकारी मिली थी. आरोप था कि फ्लैट खरीदते समय संजय दुबे ने कीमत का एक हिस्सा नकद दिया था.


बाद में आयकर विभाग ने आशा दुबे को कानूनी उत्तराधिकारी मानते हुए करीब 39.67 लाख रुपये की टैक्स देनदारी तय कर दी. आशा दुबे ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जब उनके पति का पहले ही निधन हो चुका था, तो उनके नाम पर नोटिस जारी करना ही गैरकानूनी है. इसलिए पूरी कार्रवाई रद्द की जानी चाहिए. 

हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गंभीर गलती है. ऐसी खामी को आयकर अधिनियम की धारा 292B के तहत भी ठीक नहीं किया जा सकता.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानूनी उत्तराधिकारी के खिलाफ कार्रवाई तभी जारी रह सकती है, जब करदाता के जीवित रहते कानून के अनुसार वैध तरीके से कार्रवाई शुरू की गई हो. इस तरह के मामलों में कानून की कमियों को दूर करने के लिए संसद को जरूरी संशोधन पर विचार करना चाहिए. साथ ही अदालत ने अपने आदेश की प्रति भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को भेजने का भी निर्देश दिया.

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Shivani_Mishra

Shivani Mishra Desk Editor in NewsAsr.com and having vast experience in field of Journalism

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