फिर से 150 साल पहले आए सुपर अल नीनो के लौटने का डर ; तपेगी धरती, तड़पेंगे लोग...
धरती के पानी के नीचे बहुत ज्यादा गर्म पानी का बड़ा भंडार बन गया है. ये ऊपर आ रहा है और हवा के साथ मिलकर हवा को और गर्म कर रहा है. पूरी पृथ्वी पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग से गर्म हो रही है. इसलिए जब एल नीन्यो आता है, तो उसका असर और तेज हो जाता है. कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस साल वाला 150 साल में सबसे मजबूत एल नीन्यो हो सकता है. अगर इस साल का एल नीन्यो, सुपर एल नीन्यो बन गया तो मॉनसून और भी कमजोर हो सकता है यानी बहुत कम बारिश हो सकती है, सूखा पड़ सकता है.
एक बात ये कि इस साल गर्मी ज्यादा पड़ेगी क्योंकि ‘एल नीन्यो’ असर डालेगा. ये शायद आपने सुना हो, लेकिन अब तो कह रहे हैं कि इस साल का ‘एल नीन्यो’, ‘सुपर एल नीन्यो’ होने वाला है यानी गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं. तो ये सुपर एल नीन्यो क्या बला है? ज्यादातर पब्लिक तो ये भी नहीं समझती कि एल नीन्यो क्या होता है?
देश के अधिकांश हिस्सों में पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया। दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। आने वाले दिनों में इस भीषण गर्मी और लू से राहत मिलने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
दरअसल, वैज्ञानिकों की मानें तो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली 'सुपर एल-नीनो' आकार ले रहा है, जो 1877 के बाद की सबसे विनाशकारी मौसम संबंधी घटना साबित हो सकता है। इसका सीधा असर भारत पर भी देखने को मिलेगा, क्योंकि एल-नीनो भारत की लाइफलाइन कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को भी प्रभावित करने वाला है।
पहले तो वही समझ लेना चाहिए, उसके बाद समझेंगे कि सुपर एल नीन्यो क्या होता है. तो एल नीन्यो स्पेनिश भाषा में छोटे बच्चे को कहते हैं. छोटे लड़के को या बालक. जी हां, ये बालक कुछ सालों में लौट कर आता रहता है और भारत में गर्मी बढ़ा जाता है. तो स्पैनिश में नाम क्यों है? स्पेन का हमारी गर्मी से क्या लेना-देना? तो वैसे तो स्पेन का एल नीन्यो से भी कोई लेना-देना नहीं है.
एल-नीनो एक मौसम संबंधी प्राकृतिक जलवायु घटना है, यह घटना पूर्वी प्रशांत सागर में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक होने पर बनती है। एल-नीनो के असर से पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इस गर्मी से वैश्विक पवन पैटर्न कमजोर या परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे एक श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है जो दुनिया भर की मौसम प्रणालियों को बाधित करती है।
पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म होने के साथ पूर्व की ओर बढ़ने लगता है, जिससे भारत के मौसम पर असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में भयानक गर्मी का सामना करना पड़ता है और सूखे के हालात बनने लगते हैं।1982-83 के अल नीनो के कारण वैश्विक आय में लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था, जबकि 1997-98 के "सदी के एल-नीनो" के कारण वैश्विक स्तर पर अनुमानित 5.7 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ था। ऐसे में विशेषज्ञ एल-नीनो के असर से भारी आर्थिक नुकसान की आशंका जता रहे हैं।
सामान्य दिनों में क्या होता है कि प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से यानी दक्षिण अमेरिका के पास का पानी ठंडा रहता है. वहां ठंडा पानी ऊपर आता रहता है. जबकि पश्चिमी हिस्से यानी इंडोनेशिया और फिलीपींस के पास का पानी बहुत गर्म रहता है.
हवाएं चलती है पूर्व से पश्चिम की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया की चरफ. इन हवाओं को कहते हैं ट्रेड विंड्स. ये हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की तरफ धकेलती रहती हैं. यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया वाली साइड पर गर्म पानी धकेलती रहती हैं.
इस वजह से पूर्व में ठंडा पानी ऊपर आता रहता है, यानी प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका की तरफ ठंडा पानी ऊपर आता रहता है और गर्म पानी एशिया की तरफ जाता रहता है. लेकिन हर 2 से 7 साल में कभी-कभी ट्रेड विंड्स यानी ये वाली हलाएं कमजोर पड़ जाती हैं. इसको कहते हैं एल नीन्यो.
जैसे किसी ने हवा का स्विच ऑफ कर दिया हो. तो वो गर्म पानी जो पश्चिम में जमा था, एशिया की तरफ जमा था वो अब पूर्व की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है. यानी पूरे प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. 0.5 डिग्री या उससे भी ज्यादा गर्म हो जाता है.
इससे क्या होता है कि समुद्र के ऊपर की हवा गर्म हो जाती है. गर्म हवा ऊपर उठती है, बादल बनते हैं, बारिश होती है. लेकिन ये सब वहीं दक्षिण अमेरिका के पास हो जाता है, क्योंकि हवाएं इस तरफ़ चल ही नहीं रही होतीं तो बादल एशिया की तरफ आते ही नहीं वो वहीं पर बरस जाते हैं. दक्षिण अमेरिका में बारिश ही बारिश हो जाती है.
मौसम विशेषज्ञ इसे प्रशांत महासागर में बन रहे 'सुपर एल-नीनो' से जोड़ रहे हैं। अल नीनो का संबंध दक्षिण-पश्चिम मानसून से है, जिसके कारण मानसून पर निश्चित रूप से संकट बढे़गा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह मौसम संबंधी घटना 1877 की घटना से भी बदतर हो सकती है, जिसके कारण उस समय वैश्विक आबादी के लगभग चार प्रतिशत तक लोगों की व्यापक मृत्यु हुई थी। यानी यह अल नीनो लगभग 150 साल पुराने रिकार्ड को तोड़ सकता है।
धरती के पानी के नीचे बहुत ज्यादा गर्म पानी का बड़ा भंडार बन गया है. ये ऊपर आ रहा है और हवा के साथ मिलकर हवा को और गर्म कर रहा है. पूरी पृथ्वी पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग से गर्म हो रही है. इसलिए जब एल नीन्यो आता है, तो उसका असर और तेज हो जाता है. कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस साल वाला 150 साल में सबसे मजबूत एल नीन्यो हो सकता है. अगर इस साल का एल नीन्यो, सुपर एल नीन्यो बन गया तो मॉनसून और भी कमजोर हो सकता है यानी बहुत कम बारिश हो सकती है, सूखा पड़ सकता है. गर्मी और हीटवेव की लहरें और लंबी और तेज चलेंगी. और उत्तर भारत पर, मध्य भारत पर और पश्चिम भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा ऐसा हुआ तो. तो छोटे मियां तो छोटे मियां, सुपर एल नीन्यो अगर हो गया तो भट्टी बन जाएगी धरती.