शाह-योगी की दिल्ली में मुलाकात;तैयार हुआ 'मिशन 2027' का प्लान? इधर अखिलेश ने चल दिया 'पीडीए' के बाद 'परशुराम' वाला कार्ड!

अमित शाह की संगठनात्मक क्षमता और सीएम योगी आदित्यनाथ की बेदाग व सख्त छवि का यह कॉम्बिनेशन अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठबंधन के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह तैयार कर रहा है. विपक्ष जहां अभी सीट शेयरिंग और अंदरूनी खींचतान में उलझा है, वहीं भाजपा ने 2027 के लिए अपने सबसे बड़े सूरमाओं को मैदान में उतारकर शंखनाद कर दिया है.

शाह-योगी की दिल्ली में मुलाकात;तैयार हुआ 'मिशन 2027' का प्लान? इधर अखिलेश ने चल दिया 'पीडीए' के बाद 'परशुराम' वाला कार्ड!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सबसे बड़ी घेराबंदी शुरू कर दी है. पिछले लोकसभा चुनाव में अयोध्या समेत यूपी के कुछ हिस्सों में लगे राजनीतिक झटके के बाद, भाजपा आलाकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. 


इसी सिलसिले में देश के गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच मंगलवार को कर्तव्य भवन दिल्ली में हुई एक बेहद महत्वपूर्ण और लंबी बैठक ने देश के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. 


यह मुलाकात महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि यह दिल्ली और लखनऊ के बीच उस ‘पावर ट्यूनिंग’ का हिस्सा है, जो 2027 में विपक्ष के तमाम समीकरणों को ध्वस्त करने के लिए बुनी गई है.


लोकसभा चुनाव के दौरान अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों में भाजपा की उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए थे, जिसे राजनीतिक हलकों में एक बड़ा सबक माना गया. इसके बाद विपक्ष लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. लेकिन शाह-योगी की इस ताजा बैठक ने उन सभी अटकलों पर पूरी तरह विराम लगा दिया है.


सूत्रों के मुताबिक, इस सीक्रेट मीटिंग में उत्तर प्रदेश को लेकर एक ‘त्रिस्तरीय मेगा प्लान’ तैयार किया गया है. हाल ही में हुए यूपी कैबिनेट विस्तार के बाद शाह ने सीएम योगी को पूरी तरह ‘फ्री हैंड’ दिया है. 


सपा के ‘पीडीए’ पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक कार्ड को काटने के लिए भूपेंद्र चौधरी और मनोज पांडेय जैसे हेवीवेट नेताओं और गैर-यादव ओबीसी व दलित चेहरों को जमीन पर बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही है. अयोध्या समेत पूरे सूबे में चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को समय से पहले पूरा करना और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर जीरो टॉलरेंस की नीति को और आक्रामक बनाया रहा है.


राजधानी लखनऊ की दीवारें तीखे पोस्टरों और नारों से रंग गई हैं. विपक्ष जहां ‘चढ़ावा चोरी’ के आरोपों को ढाल बनाकर सरकार को घेर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष ‘बाबर प्रेम’ का तंज कसकर ध्रुवीकरण को धार देने में जुटा है. इसी बीच, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने यूपी में ‘ब्राह्मण सम्मेलन’ कराने का ऐलान कर दिया है, जिसने सोशल इंजीनियरिंग की इस लड़ाई को बेहद दिलचस्प बना दिया है.

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इन पोस्टरों को हटाने के साथ ही इसे भारतीय जनता पार्टी की बौखलाहट करार दिया है. सपा का आरोप है कि हाल ही में अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में हुई कथित अनियमितताओं और ‘चढ़ावा चोरी’ के मुद्दे से जनता का ध्यान भटकाने के लिए बीजेपी यह ‘बाबर कार्ड’ खेल रही है.


यूपी की सियासत में इन दिनों सबसे बड़ी तकरार लखनऊ की सड़कों पर देखने को मिल रही है, जहां रातों-रात ऐसे विवादित होर्डिंग्स लगा दिए गए जिन्होंने पूरे सूबे में हंगामा खड़ा कर दिया.”दिल में बाबर, मुंह में राम”. 


हाल ही में लखनऊ, मथुरा और सीतापुर जैसे शहरों में समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाते हुए पोस्टर लगाए गए, जिन पर “दिल में बाबर, मुंह में राम” का स्लोगन लिखा हुआ था. इन पोस्टरों के जरिए सपा को हिंदू विरोधी और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई है.


बता दे कि अयोध्या के नतीजों से जो डैमेज हुआ था, भाजपा उसे एक बड़े अवसर में बदलने जा रही है. अमित शाह की संगठनात्मक क्षमता और सीएम योगी आदित्यनाथ की बेदाग व सख्त छवि का यह कॉम्बिनेशन अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठबंधन के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह तैयार कर रहा है. विपक्ष जहां अभी सीट शेयरिंग और अंदरूनी खींचतान में उलझा है, वहीं भाजपा ने 2027 के लिए अपने सबसे बड़े सूरमाओं को मैदान में उतारकर शंखनाद कर दिया है.