उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 :  दिल्ली में मिले राहुल और अखिलेश,  विधानसभा चुनावों को लेकर बनी रणनीति

बैठक में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव का गणित भी याद दिलाया। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के तहत कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, जिनमें कांग्रेस छह सीटें जीतने में सफल रही। उनका संकेत साफ था कि गठबंधन की सफलता केवल कांग्रेस की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के संगठन, कार्यकर्ताओं और सामाजिक आधार की भी देन थी।

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 :  दिल्ली में मिले राहुल और अखिलेश,  विधानसभा चुनावों को लेकर बनी रणनीति

इंडिया गठबंधन की बैठक में भाजपा के खिलाफ एकजुटता का संदेश तो दिया गया, लेकिन बैठक के भीतर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच भविष्य के शक्ति संतुलन की लड़ाई की झलक भी साफ दिखाई दी। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कांग्रेस, खासकर राहुल गांधी को यह स्पष्ट संदेश दिया कि विपक्षी एकता तभी मजबूत रह सकती है, जब क्षेत्रीय दलों को उनकी राजनीतिक ताकत के अनुरूप स्थान दिया जाए।


अखिलेश यादव ने द्रमुक और आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति का मुद्दा उठाते हुए कहा कि विपक्षी खेमे से जुड़े दलों को साथ बनाए रखने की जिम्मेदारी कांग्रेस को निभानी होगी। उन्होंने संकेत दिया कि सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस को अधिक उदार और समन्वयकारी भूमिका अपनानी चाहिए।


बैठक में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव का गणित भी याद दिलाया। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के तहत कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, जिनमें कांग्रेस छह सीटें जीतने में सफल रही। उनका संकेत साफ था कि गठबंधन की सफलता केवल कांग्रेस की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के संगठन, कार्यकर्ताओं और सामाजिक आधार की भी देन थी।


दरअसल, अखिलेश का यह बयान केवल पुराने चुनाव का मूल्यांकन नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश भी है। समाजवादी पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का केंद्र वही है और भविष्य के किसी भी सीट बंटवारे में उसकी भूमिका निर्णायक रहेगी।


लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति बनकर उभरी थी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि गठबंधन की सफलता का मुख्य आधार उसका सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक नेटवर्क था। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले वह अपनी केंद्रीय भूमिका लगातार रेखांकित कर रही है।

तथ्य यह भी है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे केवल दो सीटों पर जीत मिली। जबकि गठबंधन की राजनीति में उसकी स्थिति मजबूत हुई और लोकसभा चुनाव में उसे बेहतर परिणाम मिले। इसी आधार पर सपा नेतृत्व भविष्य की राजनीतिक बातचीत का आधार तय करना चाहता है।


दिलचस्प यह है कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर साझा संघर्ष की बात करने के साथ-साथ क्षेत्रीय दल कांग्रेस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी अपना रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को महत्वपूर्ण सहयोगी तो मानते हैं, लेकिन नेतृत्वकारी भूमिका देने के पक्ष में नहीं दिखाई देते।

यही वजह है कि भारत गठबंधन की बैठक में अखिलेश और तेजस्वी की जुगलबंदी केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। इसे आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक अहमियत और जमीनी ताकत का एहसास कराने वाले स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है।