BJP से SP तक सबके फोकस में: यादवों से भी ज्यादा कुर्मी वोटरों की क्यों हो रही चर्चा?
प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज की आबादी भले ही आठ प्रतिशत हो, लेकिन 70 से 80 विधान सभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है. खासकर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्रों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर जीत-हार का रुख तय करते हैं.
उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा का चुनाव होना है. लोकतंत्र के इस महापर्व को लेकर सभी राजनीतिक दलें अपनी-अपनी तैयारियों में जुट चुकी हैं. सत्तारूढ़ भाजपा हो या विपक्ष सपा, बसपा हो या कांग्रेस... सभी पार्टियां अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश में जुट चुकी हैं.
जातिगत आंकड़े मिलाए जा रहे हैं, वोट बैंक के हिसाब से जातियों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. ताकि उनके बीच दलों का जनाधार मजबूत हो. लेकिन इस कोशिश के बीच यूपी की राजनीति से एक रोचक चीज यह देखने को मिल रही है कि यादवों से ज्यादा कुर्मी वोटरों की चर्चा तेज हो गई है. भाजपा से लेकर सपा तक ने कुर्मी वोटरों पर फोकस बढ़ा दिया है.
उत्तर प्रदेश की सियासत में कुर्मी, यादवों के बाद OBC की दूसरी सबसे बड़ी जाति है. यही कुर्मी समाज भाजपा की नई रणनीति का केंद्र बनी है. जब केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाया था तो उसे जानकार 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संदेश मान रहे थे.
इससे पहले भी भाजपा का कुर्मी कार्ड वर्ष 2022 में सफल हुआ था, उस समय स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे और भाजपा की पांच वर्ष सरकार रहने के बावजूद 403 में से 255 सीटें मिली थीं.
प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज की आबादी भले ही आठ प्रतिशत हो, लेकिन 70 से 80 विधान सभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है. खासकर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्रों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर जीत-हार का रुख तय करते हैं.
2001 में यूपी सरकार की बनाई हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, कुर्मी (और पटेल) की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. यह रिपोर्ट ग्रामीण परिवार रजिस्टरों पर आधारित थी. इसमें OBC की कुल आबादी 50% से अधिक बताई गई थी.
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