सेवानिवृत्ति के बाद 85 की उम्र में जीती दरोगा से इंस्पेक्टर बनने की 46 साल चली कानूनी लड़ाई
कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि याची राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद की पदोन्नति का लाभ दिया जाए। साथ ही उनकी सेवानिवृत्ति तक का वेतन और अन्य अनुमन्य लाभ व उसके अनुरूप सेवानिवृत्तिगत लाभों की गणना कर भुगतान चार सप्ताह में किया जाए।
इंस्पेक्टर बनने की 46 साल चली कानूनी लड़ाई एक दरोगा ने सेवानिवृत्ति के बाद 85 की उम्र में जीत ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व दरोगा को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने इटावा निवासी राम अवतार सिंह यादव की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस विभाग यह साबित नहीं कर सका कि जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर पदोन्नति रोकी गई, वे उन्हें कभी बताई भी गई थीं। कोर्ट ने माना कि पदोन्नति के मामले में पुलिस विभाग ने याची के साथ अन्याय व भेदभाव किया।
राम अवतार सिंह यादव 1999 में थानाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पदोन्नति नहीं मिलने पर उन्होंने विभाग को प्रत्यावेदन दिया था। डीजीपी ने छह अप्रैल 2010 को उनकी पदोन्नति का दावा खारिज कर दिया था।
इसके बाद उन्होंने राज्य लोक सेवा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी याचिका 30 नवंबर 2012 को व समीक्षा याचिका 10 जून 2013 को खारिज हो गई। इसके खिलाफ उन्हों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जो अदम पैरवी में 16 फरवरी 2015 को खारिज हो गई। इसके बाद याची ने पुनर्स्थापना अर्जी दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने खारिज हो चुकी याचिका को बहाल कर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने पाया कि तत्कालीन डीजीपी के आदेश में कहा गया था कि याची को पदोन्नति के लिए चयन प्रक्रिया में शामिल किया गया था। उसका साक्षात्कार भी हुआ था। हालांकि, विभाग याची और अन्य सफल अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों का कोई अभिलेख या अंकपत्र पेश नहीं कर सका।
'प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी याची को कभी नहीं मिली'
याची की सेवा पुस्तिका में वर्ष 1973, 1975, 1978, 1979, 1981, 1987 और 1994 की प्रतिकूल प्रविष्टियों का उल्लेख था, लेकिन विभाग यह साबित नहीं कर सका कि ये प्रविष्टियां याची को विधिवत बताई गई थीं या नहीं। वहीं, याची ने भी यही दलील दी कि प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी उन्हें कभी नहीं दी गईं।
कोर्ट ने अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की। कहा कि किसी व्यक्ति से यह साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसे कोई बात कभी बताई ही नहीं गई। नकारात्मक तथ्य साबित करना संभव नहीं होता। विभाग को यह साबित करना चाहिए था कि प्रतिकूल प्रविष्टियों से याची को विधिवत अवगत कराया गया था। अधिकरण ने इस पहलू पर याची पर नकारात्मक तथ्य साबित करने का भार डालकर विधिक चूक की।
कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि याची राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद की पदोन्नति का लाभ दिया जाए। साथ ही उनकी सेवानिवृत्ति तक का वेतन और अन्य अनुमन्य लाभ व उसके अनुरूप सेवानिवृत्तिगत लाभों की गणना कर भुगतान चार सप्ताह में किया जाए।
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